हिंदूओं का त्योहार कई रंगों और खुशियों को लेकर आता है। इसमें गणेश पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा, सरस्वती पूजा प्राय: देखें तो ज्यादातर त्योहारों से पहले प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इसको धूमधाम से मनाने के लिए लोग पहले ढोल, ताशों और नगाड़ों का उपयोग करते थे। यह मनमोहक हुआ करता था। आधुनिकता का दौर है, इलेक्ट्रानिक चीजें भरपूर उपलब्ध हैं वह भी सस्ते में। वर्तमान में देखने मिलता है कि लोग भूर्ति विसर्जन के मौके पर डीजे का उपयोग करते हैं। यह कितना जरूरी है। कुछ वर्षों से मूर्ति पूजा के दौरान मुझे रिपोर्टिंग करने का मौका मिला है। वहां एक बात अक्सर देखता हूं की तेज साउंड इसे मैं कानफोड़ू सांउंड कहू तो कोई आपत्ति नहीं है इसके बीच छोटे-छोटे बच्चे शराब पीकर लगातार डांस करते हैं। मूर्ति विसर्जन श्रद्धा और शांति के लिए लेकिन उसे प्रवाहित करने के दौरान शराब जो श्रद्धा उत्पन्न कर ही नहीं सकता और तेज साउंड डीजे जो शांति कभी फैला ही नहीं सकता। लोग आधुनिक हो रहे हैं ठीक है, लेकिन इस प्रकार की सभ्यता शुरू करना वह भी लोगे के चंदे पर यह सही नहीं। लोगों ने यही सब कुराफात देखकर चंदा देना कम भी किया है, लेकिन उनकी श्रद्धा हर बार उन्हें नहीं रोक पाती। 10 दिनों तक देवी-देवताओं को पूजा करने सर आंखो पर बैठाने के बाद उसे बेदर्दी के साथ नदी में डाल देना। उतनी बड़ी-बड़ी मूर्तियों को यह बड़ी बात हो सकती है। मैं न आस्तिक हूं न ही नास्तिक छोटी मूर्तियां पूजा के लिए रखी जाएं तो ज्यादा बेहतर होगा। शहर के विभिन्न चौकों से इनके एक साथ शोभायात्रा निकले तो ज्यादा बेहतर लगेगा। यह क्या कि जब डीजे वाला तय करेगा तब विसर्जन होगा। आस्था है तो धर्मग्रंथों के अनुसार समय पर प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाए। गणेश पूजा अभी बिता पितृ पक्ष में लोगों को प्रतिमाओं का विसर्जन करते हुए देखा। ठीक है विसर्जन में भीड़ नहीं मिली, लेकिन यह सही भी तो नहीं है न। अपने किसी रिस्तेदार के मृत्यु के बाद कितने दिनों तक पार्थिव शरीर को घर पर रखा जाता है। इन प्रतिमाओं में देवताओं का वास होता है। उनके चले जाने के बाद वह भी उसी पार्थिव शरीर की तरह हो जाता है। इसके नुकसान ही होते हैं फायदे नहीं। पूरी श्रद्धा तब ही खत्म हो जाती है।
गुलामी के वक्त भले ही कलम से आजादी की लड़ाई लड़ी गई हो, लेकिन अब वह खुद गुलाम हो चुकी है। कार्पोरेट कंपनियां कलम के मालिक बन बैठे हैं। वहीं कुछ को सत्ता ने तो कुछ को विपक्ष ने खरीद लिया है। यह यूं नहीं हुआ, वक्त के साथ जब कलम कमजोर पड़ी तब ही Keyboard शक्तिशाली हुआ। फिर वह समय आ गया जब कलम दुकानों में बिकने लगी और उसी दुकान की शोभा बन बैठे Keyboard। साथ ही कलम की आजादी गुलामी में बदल गई। कलम के आजादी की लड़ाई आसान नहीं है, यह लड़ाई अब Keyboard से लड़नी होगी। पत्रकार
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015
गुरुवार, 13 अगस्त 2015
कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करना क्यों अवमानना है?
कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी नहीं किया जाना चाहिए वह अवमानना होता है, लेकिन क्यों क्योंकि वहां होने वाले भ्रष्टाचार को उजागर नहीं किया जाना चाहिए। फैसले को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता। इतना ही नहीं कई मामलों में तो पक्षकार तक को पता नहीं होता कि फैसला हुआ क्या है। जिस क्षेत्र में हो उस क्षेत्र के हिसाब के भाषा में फैसला क्यों नहीं किया जाता क्या यह कानून सबके लिए समान है। नहीं इसलिए नहीं है क्योंकि समान कानून व्यवस्था भारत में है ही नहीं। जिसके पास पैसा है वह सुप्रीम कोर्ट तक से चंद दिनों में बाहर आ जाता है जिसके पास पैसा नहीं वह पुरी जिंदगी जेल में काट डालता है। उसे न्याय कैसे मिला। कोर्ट के सारे मामलो के लिए पीआरओ क्यों नहीं नियुक्त किया जाता ताकि वे सारी बाते स्पष्ट तौर पर मीडिया और सोशल मीडिया पर शेयर करें। सही जो हो वह लोगों तक पहुंचे। जिस क्षेत्र का कोर्ट हो उस क्षेत्र के भाषा के साथ हो। अगर छत्तीसगढ़ में है तो छत्तीसगढ़ी के साथ हिंदी और अंग्रेजी में क्यों फैसला नहीं होता। झारखंड और उत्तरप्रदेश बिहार में भोजपुरी और हिंदी अंग्रेजी में फैसला क्यों नहीं होता सारे पक्षकार अंग्रेजी जानते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि कई वकिल पक्षकारों को अंग्रेजी में लिखे होने के कारण गलत बता देतें है। हालांकि यह कम ही होता है लेकिन इससे पक्षकारों का समय के साथ भारी मात्रा में धन बर्बाद होता है। इसे कोर्ट क्यों नहीं देखती। सब जगहों पर कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी होना लाजमी है। आने वाले समय में कोर्ट को डराने के लिए हथियार के रूप में लोग यूज करना शुरू करने वाले हैं। करने वाले नहीं करना शुरु कर दिए हैं।
दबंग भाई सल्लू की दीदी जयललीता को भी हाईकोर्ट से बड़ी राहत
हिट एंड रन केश में निचली अदालत से 5 साल की सजा मिलने के बाद हाईकोर्ट से अभिनेता सलमान खान को बड़ी राहत दी गई। इसी कड़ी में जयललीता को आय से अधिक संपत्ति मामले में हाईकोर्ट से दोषमुक्त कर दिया गया। इस फैसले के बाद जयललीता के जहां मुख्यमंत्री बनने का सपना एक बार फिर साकार हो सकता है वहीं राजनीतिक गलियारे में उनकी मौजूदगी हलचल मचा सकती है। दबंग सलमान तो सिर्फ फिल्मों में दबंग का रोल अदाकारी से किया है जयललीता तो असली दबंगई करती रही हैं। लोक सभा चुनाव के समय थर्ड फ्रंट का नाम आने के बाद कांग्रेस और भाजपा के पसीने छूट गए थे। अब जब की जयललीता दोषमुक्त हो चुकी है तो उनको बदनाम करने वाली संस्था के दो-चार कर्मचारियों पर कार्रवाई भी कर दिया जाए। हालांकि इस तरह के गतिविधियों और कार्रवाईयों को राजनीति का ही एक हिस्सा माना जा रहा है। इसमें स्वयं को हाइलाइट करके दिखाने के लिए झूठे एफआईआर और जेल भेजकर पब्लिक से सहानुभूति लेना। हालांकि जनता अब समझदार हो गई है, सब समझने लगी है लेकिन खुद को समझा नहीं पाती की जो हकिकत वे देख रहे हैं दरअसल वह है ही नहीं वह तो मिरीचिका है। खैर जो हुआ वह अच्छा है या बुरा यह तो वे आप अच्छे से तय कर लिए होंगे. मैं अगर अब यहां लिख भी दूं की भ्रष्ट्राचार की दलदल में पुरा देश डुबा हुआ है इसे आप थोड़े मानेंगे जो हकिकत होगा उसे मैं आपसे तो छीपा नहीं पाउंगा।
बुधवार, 12 अगस्त 2015
जज कब मानेंगे वे सरकारी के नुमाइंदे नहीं है
जिला कोर्ट हो या हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट यहां के जज कब मानेंगे कि वे सरकार की कठपुतली नहीं अपने आप में सुप्रीम कोर्ट होते हैं। उनके फैसले अपने आप में महत्वपूर्ण होते है। कुछ दिनों से देखने मिल रहा है कि सरकार जैसा संसोधन कर दिया बस जज उसे मान लिए। कितने विधिविधाई मंत्री एलएलबी या एलएलएम हैं। नहीं के बराबर इसके बाद भी उन्हें कानून मंत्री बना दिया जाता है। अब बोए पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय वाली कहावत इसलिए चरितार्थ कर रहे हैं क्योंकि सोर्श के दम पर जज बन गए हैं तो जो सरकार चाहेगी वहीं करना होगा।
शुक्रवार, 1 मई 2015
आरक्षण के खेल का निकल रहा है तेल, धर्म बदलने पर भी आरक्षण मिलता है
छत्तीसगढ़ में धर्म परिवर्तन को लेकर मुहिम सा चल पड़ा है। एक समय यह आदिवासी बाहुल्य राज्य था। अब यहां की आबादी में ज्यादातर परिवर्तित धर्म के आदिवासी रह रहे हैं। यह खेल है उन तमाम आदिवासियों के साथ जो हिंदू धर्म अपनाए हुए हैं। चालाक धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासी दोहरा लाभ लेकर इन्हें चपत लगा रहे हैं। सूत्रों की माने तो धर्म परिवर्तन के लिए लाखों रुपए इन्हें मिलते हैं इसके साथ ही कई तरह के लाभ भी दूसरे धर्म के लोग देते हैं। वहीं हिंदू धर्म को मानने वाले आदिवासीयों को सही जानकारी नहीं होने के कारण बेचारों को उनके हक का लाभ तक नहीं मिल रहा है। वहीं दूसरे धर्म वाले तथाकथित आदिवासी (क्योंकि धर्म परिवर्तन करने के बाद उनकी आरक्षण खत्म हो जाती है) हिंदू धर्म के लोगों को मिलने वाले लाभ इसमें आरक्षण का लाभ भी ले रहे हैं। ये लोग शिक्षीत भी ज्यादा है क्योंकि दूसरे धर्म के लोग अपने स्कूलों में इन्हें नि:शुल्क पढ़ाकर शिक्षित कर रहे हैं। यह अजब का खेल है जिसे दूसरे धर्म के लोग खेल रहे हैं। खेल धर्म परिवर्तन का है। आरक्षण का है, आरक्षण से मिलने वाले लाभ से है। धर्म परिवर्तन के बाद क्या लाभ मिलना चाहिए यह बड़ा सवाल है। अगर नहीं तो फिर जशपुर, सरगुजा, बस्तर सहित कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां हर दिन धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। घर वापसी के लिए कई दशक पहले जशपुर के राजकुमार दिलीप सिंह जुदेव ने मुहिम चलाया था। उस समय भी इस मामले को उठाया गया था। तब से अब तक सिर्फ राजनीति के कारण इस मामले को सही जगह नहीं मिल सका। मुद्दा है पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। बोट बैंक के राजनीति के कारण इस ओर ध्यान न देकर सही लाभ जिन्हें मिलनी चाहिए उनके हक को छीना जा रहा है। यह कैसी नीति है? समझ नहीं आता, यह कैसा खेल हो रहा है आदिवासीयों के साथ।
बुधवार, 18 मार्च 2015
लगता है शरद यादव पगला गए हैं...
कुछ सालों से राजनेताओं के चाल, चलन, चरित्र, चेहरे और बोल बदल रहे हैं। ऐसे राजनेताओं को सिर्फ जूता मारने का मन होता है। खासकर ऐसे नेता जो जब मन आए जो मन आए बोलना शुरू कर देते हैं। यही हाल अभी एक नेता शरद यादव का है। पहले साउथ की महिलाओं को अनाप-शनाप बोला उसके बाद अब साथी महिला नेत्री को उल्टा-सीधा बोल दिया। इससे उसके बारे में पता चलता है कि आप अपने घर के लोगों के साथ किस तरह रहते होगे। दो कौड़ी की मानसिकता आपके राजनीतिक के बारे में पूरी जनाकारी बयां कर रही है।
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015
केशकाल पहले से मरू भूमि है और क्यों जला रहे हो
छत्तीसगढ़ में जितना प्रसिद्ध बस्तर है देश दुनिया में उतना राजधानी भी नहीं है। यह प्रसिद्धि किसी खासियत के कारण नहीं बल्कि नासूर नक्सलवाद के कारण है। यहां के लोग भय और दहशत में दिन-रात गुजारते हैं। यहां पहले ही इतनी लाशें गिर चुकी है कि लोग इसे मरू भूमि मानने लगे हैं। अभी यहां दंगा फैल गया है। यह पहले से मरू भूमि है और इसे क्यों जलाया जा रहा है समझ नहीं आता। यहां के लोगों को इतना मरने का शौक क्यों है। और मरना है तो अच्छे काम के लिए मरो वेवकूफी में क्यों पड़े हुए हैं समझ नहीं आता। लोग पता नहीं क्यों हिन्दु-मुस्लिम लड़ रहे हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)