जिला कोर्ट हो या हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट यहां के जज कब मानेंगे कि वे सरकार की कठपुतली नहीं अपने आप में सुप्रीम कोर्ट होते हैं। उनके फैसले अपने आप में महत्वपूर्ण होते है। कुछ दिनों से देखने मिल रहा है कि सरकार जैसा संसोधन कर दिया बस जज उसे मान लिए। कितने विधिविधाई मंत्री एलएलबी या एलएलएम हैं। नहीं के बराबर इसके बाद भी उन्हें कानून मंत्री बना दिया जाता है। अब बोए पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय वाली कहावत इसलिए चरितार्थ कर रहे हैं क्योंकि सोर्श के दम पर जज बन गए हैं तो जो सरकार चाहेगी वहीं करना होगा।
गुलामी के वक्त भले ही कलम से आजादी की लड़ाई लड़ी गई हो, लेकिन अब वह खुद गुलाम हो चुकी है। कार्पोरेट कंपनियां कलम के मालिक बन बैठे हैं। वहीं कुछ को सत्ता ने तो कुछ को विपक्ष ने खरीद लिया है। यह यूं नहीं हुआ, वक्त के साथ जब कलम कमजोर पड़ी तब ही Keyboard शक्तिशाली हुआ। फिर वह समय आ गया जब कलम दुकानों में बिकने लगी और उसी दुकान की शोभा बन बैठे Keyboard। साथ ही कलम की आजादी गुलामी में बदल गई। कलम के आजादी की लड़ाई आसान नहीं है, यह लड़ाई अब Keyboard से लड़नी होगी। पत्रकार
बुधवार, 12 अगस्त 2015
शुक्रवार, 1 मई 2015
आरक्षण के खेल का निकल रहा है तेल, धर्म बदलने पर भी आरक्षण मिलता है
छत्तीसगढ़ में धर्म परिवर्तन को लेकर मुहिम सा चल पड़ा है। एक समय यह आदिवासी बाहुल्य राज्य था। अब यहां की आबादी में ज्यादातर परिवर्तित धर्म के आदिवासी रह रहे हैं। यह खेल है उन तमाम आदिवासियों के साथ जो हिंदू धर्म अपनाए हुए हैं। चालाक धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासी दोहरा लाभ लेकर इन्हें चपत लगा रहे हैं। सूत्रों की माने तो धर्म परिवर्तन के लिए लाखों रुपए इन्हें मिलते हैं इसके साथ ही कई तरह के लाभ भी दूसरे धर्म के लोग देते हैं। वहीं हिंदू धर्म को मानने वाले आदिवासीयों को सही जानकारी नहीं होने के कारण बेचारों को उनके हक का लाभ तक नहीं मिल रहा है। वहीं दूसरे धर्म वाले तथाकथित आदिवासी (क्योंकि धर्म परिवर्तन करने के बाद उनकी आरक्षण खत्म हो जाती है) हिंदू धर्म के लोगों को मिलने वाले लाभ इसमें आरक्षण का लाभ भी ले रहे हैं। ये लोग शिक्षीत भी ज्यादा है क्योंकि दूसरे धर्म के लोग अपने स्कूलों में इन्हें नि:शुल्क पढ़ाकर शिक्षित कर रहे हैं। यह अजब का खेल है जिसे दूसरे धर्म के लोग खेल रहे हैं। खेल धर्म परिवर्तन का है। आरक्षण का है, आरक्षण से मिलने वाले लाभ से है। धर्म परिवर्तन के बाद क्या लाभ मिलना चाहिए यह बड़ा सवाल है। अगर नहीं तो फिर जशपुर, सरगुजा, बस्तर सहित कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां हर दिन धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। घर वापसी के लिए कई दशक पहले जशपुर के राजकुमार दिलीप सिंह जुदेव ने मुहिम चलाया था। उस समय भी इस मामले को उठाया गया था। तब से अब तक सिर्फ राजनीति के कारण इस मामले को सही जगह नहीं मिल सका। मुद्दा है पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। बोट बैंक के राजनीति के कारण इस ओर ध्यान न देकर सही लाभ जिन्हें मिलनी चाहिए उनके हक को छीना जा रहा है। यह कैसी नीति है? समझ नहीं आता, यह कैसा खेल हो रहा है आदिवासीयों के साथ।
बुधवार, 18 मार्च 2015
लगता है शरद यादव पगला गए हैं...
कुछ सालों से राजनेताओं के चाल, चलन, चरित्र, चेहरे और बोल बदल रहे हैं। ऐसे राजनेताओं को सिर्फ जूता मारने का मन होता है। खासकर ऐसे नेता जो जब मन आए जो मन आए बोलना शुरू कर देते हैं। यही हाल अभी एक नेता शरद यादव का है। पहले साउथ की महिलाओं को अनाप-शनाप बोला उसके बाद अब साथी महिला नेत्री को उल्टा-सीधा बोल दिया। इससे उसके बारे में पता चलता है कि आप अपने घर के लोगों के साथ किस तरह रहते होगे। दो कौड़ी की मानसिकता आपके राजनीतिक के बारे में पूरी जनाकारी बयां कर रही है।
गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015
केशकाल पहले से मरू भूमि है और क्यों जला रहे हो
छत्तीसगढ़ में जितना प्रसिद्ध बस्तर है देश दुनिया में उतना राजधानी भी नहीं है। यह प्रसिद्धि किसी खासियत के कारण नहीं बल्कि नासूर नक्सलवाद के कारण है। यहां के लोग भय और दहशत में दिन-रात गुजारते हैं। यहां पहले ही इतनी लाशें गिर चुकी है कि लोग इसे मरू भूमि मानने लगे हैं। अभी यहां दंगा फैल गया है। यह पहले से मरू भूमि है और इसे क्यों जलाया जा रहा है समझ नहीं आता। यहां के लोगों को इतना मरने का शौक क्यों है। और मरना है तो अच्छे काम के लिए मरो वेवकूफी में क्यों पड़े हुए हैं समझ नहीं आता। लोग पता नहीं क्यों हिन्दु-मुस्लिम लड़ रहे हैं।
रविवार, 12 अक्टूबर 2014
हुदहुद चक्रवात और उससे नुकसान
देश में आया 'हुदहुद' चक्रवात उसके कारण और नुकसान
देश के समुद्री क्षेत्रों में चक्रवात हुदहुद को लेकर एलर्ट है। इसी चक्रवात पर हम बात कर रहे हैं। इसका नाम हुदहुद कैसे पड़ा यह कहां-कहां कितना असर डाला और डाल रहा है। यह चक्रवात बंगाल की खाड़ी में उत्तरी अंडमान के पास उठा है और अब यह आंध्रप्रदेश और ओडिशा तेज़ी से बढ़ रहा है। यह चक्रवात हलांकि भारत पर ज्यादा असर डाला है पर इसका नामकरण “हुदहुद” ओमान ने किया है। खबरों के अनुसार हुदहुद अरबी भाषा में हूपु नाम की चिड़िया को कहा जाता है जिसपर इसका नाम रखा गया है। चक्रवातों के नाम रखने के पीछे की कहानी यहां हम आपको बताएंगे। फिलहाल जानते हैं कि क्या है चक्रवात और इनका नाम कैसे रखा जाता है। यह कहानी 1953 से शुरु होती है जब मायामी नेशनल हरीकेन सेंटर और वर्ल्ड मेटीरियोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन (डब्लूएमओ) ने तूफ़ानों और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के नाम रखता शुरु किया था। आपको बताते चलें कि डब्लूएमओ जेनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसी है फिर भी उत्तरी हिंद महासागर में उठने वाले चक्रवातों का कोई नाम नहीं रखा क्योंकि ऐसा करना काफ़ी विवादास्पद काम था। भारत के चक्रवात चेतावनी केंद्र के प्रमुख डॉक्टर एम माहापात्रा के मुताबिक़ इसके पीछे कारण यह था कि जातीय विविधता वाले इस क्षेत्र में हमें काफ़ी सावधान और निष्पक्ष रहने की ज़रूरत थी ताकि यह लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाए। डब्ल्यूएमओ के लिए 2004 में तब स्थिति बदली, जब डब्लूएमओ की अगुवाई वाली अंतरराष्ट्रीय पैनल भंग कर दी गई और अपने-अपने क्षेत्र में आने वाले चक्रवात का नाम ख़ुद रखने को कहा गया। इसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, श्रीलंका और थाईलैंड को मिलाकर कुल आठ देशों ने हिस्सा लिया। इन देशों ने 64 नामों की एक सूची सौंपी। हर देश ने आने वाले चक्रवात के लिए आठ नाम सुझाए यह सूची हर देश के वर्ण क्रम के अनुसार है। इस क्षेत्र में आने वाला आख़िरी चक्रवात जून में आने वाला ‘नानुक’ था, जिसका नाम म्यांमार ने रखा था। सदस्य देशों के लोग भी नाम सुझा सकते हैं। मसलन भारत सरकार इस शर्त पर लोगों की सलाह मांगती है कि नाम छोटे, समझ आने लायक, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और भड़काऊ न हों। वर्ण क्रम के अनुसार इस बार ओमान की बारी थी, और उसने हुदहुद नाम रखा। पिछले साल भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर आए पायलिन चक्रवात का नाम थाईलैंड ने रखा था। इस सूची में शामिल भारतीय नाम काफ़ी आम नाम हैं, जैसे मेघ, सागर, और वायु। अगली बार इस इलाको में चक्रवात के नामकरण की बारी पाकिस्तान की होगी। इसे नीलोफ़र कहा जाएगा। पिछली बार पाकिस्तान ने नवंबर 2012 में जिस चक्रवात का नाम रखा था उसे 'निलम' कहते हैं। डॉक्टर महापात्रा के अनुसार हुदहुद संभवतः इस सूची का 34वां नाम है। इसका मतलब है कि अभी इस सूची में 30 नाम और हैं। चक्रवात विशेषज्ञों का पैनल हर साल मिलता है और ज़रूरत पड़ने पर सूची फिर से भरी जाती है। ऐसा नहीं कि 64 नामों की इस सूची को लेकर कोई विवाद नहीं रहा। 2013 में श्रीलंका की ओर से रखे 'महासेन' नाम को लेकर श्रीलंका के राष्ट्रवादियों और अधिकारियों ने विरोध जताया था जिसे बाद में बदलकर 'वियारु' कर दिया गया। उनके मुताबिक़ राजा महासेन श्रीलंका में शांति और समृद्धि लाए थे। इसलिए आपदा का नाम उनके नाम पर रखना ग़लत है। (इस लेख को बीबीसी के समाचार पढ़ने के बाद लिखा गया है)। चक्रवाती तूफान हुदहुद विशाखापत्तनम तट से टकरा गया है। इसके साथ ही तेज हवाओं के साथ हो रही भारी बारिश ने तबाही मचानी शुरू कर दी है। चक्रवात हुदहुद ने आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कई इलाको को अपनी चपेट में ले लिया है। तूफान की वजह से आंध्र-ओडिास में अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि हवा की रफ्तार अब कुछ धीमी हो गई है और विशाखापट्टनम में यह 120-130 किलोमीटर प्रति घंटे से चल रही है। दूसरी ओर भारी बारिश की वजह से कई इलाकों में बिजली गुल है। हुदहुद तूफान सबसे पहले विशाखापत्तनम के कैलाशगिरी में टकराया। इंडियन नेवी ने करीब 11 बजे बताया कि तूफान तट पर पहुंच गया है और अब इसका बुरा असर देखने को मिलने लगा है। विशाखापत्तनम समेत समूचे तटीय आंध्र में तेज बारिश हो रही है। कई इलाकों में पानी भर जाने से यातायात पर भी गहरा असर पड़ा है। अभी तक 1.5 लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया जा चुका है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने आंध्र प्रदेश और ओडिशा के अलावा पश्चिम बंगाल और झारखंड में भी हुदहुद के कारण भारी बारिश की संभावना जताई है। मौसम विभाग के अनुसार अगले 48 घंटों में उत्तरी आंध्र प्रदेश के पश्चिमी और पूर्वी गोदावरी, विशाखापत्तनम, विजयनगरम और श्रीकाकुलम जिलों में तथा ओडिशा के गंजम, गजपति, कोरापुट, रायगढ़ा, नबरंगपुर, मल्कानगिरि, कालाहांडी और फुलबानी जिलों में अधिकतर जगहों पर भारी बारिश (6.5-12.4 सेंटीमीटर), जबकि कुछ स्थानों पर अत्यंत भारी (12.5-24.4 सेंटीमीटर) बारिश और कुछेक जगहों पर भारी से भारी बारिश (24.5 सेंटीमीटर) हुई। दहुद के खतरे को देखते हुए तैयारियां तेज कर दी गई हैं और आंध्र प्रदेश और ओडिशा के तटीय जिलों के निचले इलाकों से हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। आंध्र के पांच तटीय जिलों से करीब 2 लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। सरकार ने 5 लाख लोगों को वहां से निकालने की तैयारी भी कर रखी है। राहत और बचाव कार्य के लिए सेना और नौसेना के लोगों को तैयार रखा गया है। इसके लिए तटीय जिलों में 146 चक्रवात राहत केंद्र स्थापित किए गए हैं। राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) ने राहत व बचाव अभियान के लिए 19 टीमें तैनात की हैं। प्रत्येक टीम में 45 से 50 सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त बड़ी संख्या में सैन्यकर्मी विशाखापत्तनम में तैनात हैं। मौसम विभाग के अनुसार तूफान हुदहुद के चलते कच्चे मकानों को जबर्दस्त नुकसान हुआ है। इसके प्रभाव से कई इलाकों में बड़े पेड़ उखड़ गए हैं। रेल व सड़क परिवहन को भी नुकसान हुआ है। इस बात को ध्यान में रखते हुए 60 से ज्यादा ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं और कई ट्रेनों का मार्ग भी बदला गया है।
यह लेख लेखक समाचारों को पढ़कर लिखा है।
गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014
पटना का हादसा...खुशियों का दहन
दसहरे के दिन रावण दहन के दौरान पटना के गांधी मैदान में 5 लाख लोगों की भीड़ थी। जैसे ही रावण जलना शुरु हुआ लोगों में अफवाह फैल गई की बिजली का तार गिर गया है। लोगों में भगदड़ मच गई। दरवाजे पर बताया जाता है कि पहले एक महिला गिरी उसे उठाने के लिए तीन लोग झुके वे पीछे से भगदड़ की भीड़ की चपेट में आ गए और यहां से ही शुरु हुआ गिरने और भीड़ के पैरों तले कुचलकर खुशियों के रौंदाने का दौर। लोगों ने रावण के रुप में अपनी खुशियां यहां दहन कर दिए। बहुत भवायव हादसा था 33 लोग मरे। हादसा हमें हमेशा याद रहती हैं चाहे वो कुंभ मेले के समय हुई हो या फिर मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, असम की। नवरात्रि के अवसर पर बिहार की ही घटना हो या फिर कहीं और का हादसा। बस इन हादासाओं में होती है तो खुशियों का अंत और अंत भी इतना दर्दनाक की उफ्फ तक नहीं निकल पाता ऐसे हादसों को देखकर बे जुबान हो जाते हैं हम हादसों के कारण। कितने लोग इन हादसाओं मे अपनों को खो देते हैं कितने खुद के शरीर को खो देते है। हादसा अक्सर और हमेशा से दुखद रहा है पर खुशी के मौके पर जब हादसा होता है तो वह ज्यादा ही दुखद हो जाता है। उत्तराखंड की घटना याद है लाखों लोगों को सेना ने बड़ी मशक्कत करके बचाई थी।
हादसा होने के बाद राजनीति रंग जो दिया जाता है वह ज्यादा दुखद होता है। लोग अपनों को खोए होते हैं और नेता आरोप प्रत्यारोप में रह जाते हैं जबकि पहल ऐसी होनी चाहिए ताकी दुबारा ऐसा हादसा न हो। वैसे भारत में हादसे से लोग सिख नहीं लेते बल्कि वे लोग बस इस हादसे को याद रखते हैं जिनके अपने इन हादसों में हमेशा के लिए खो जाते हैं। बाकि उस हादसे को हादसे की तरह ही भूल जाते हैं जो गलत है और यही हमें फिर हादसे तक पहुंचा देता है। हमें हादसों और घटनाओं से हमेशा सिख लेना चाहिए। इससे अगर सिख नहीं लिया गया तो हमेशा हादसों के मुंह में हम रहते हैं। इस दसहरें में तो हमने अपने खुशीयों का दहन कर दिया पर अगले में ना करें यह संकल्प लेना होगा.
हादसा होने के बाद राजनीति रंग जो दिया जाता है वह ज्यादा दुखद होता है। लोग अपनों को खोए होते हैं और नेता आरोप प्रत्यारोप में रह जाते हैं जबकि पहल ऐसी होनी चाहिए ताकी दुबारा ऐसा हादसा न हो। वैसे भारत में हादसे से लोग सिख नहीं लेते बल्कि वे लोग बस इस हादसे को याद रखते हैं जिनके अपने इन हादसों में हमेशा के लिए खो जाते हैं। बाकि उस हादसे को हादसे की तरह ही भूल जाते हैं जो गलत है और यही हमें फिर हादसे तक पहुंचा देता है। हमें हादसों और घटनाओं से हमेशा सिख लेना चाहिए। इससे अगर सिख नहीं लिया गया तो हमेशा हादसों के मुंह में हम रहते हैं। इस दसहरें में तो हमने अपने खुशीयों का दहन कर दिया पर अगले में ना करें यह संकल्प लेना होगा.
बुधवार, 8 अक्टूबर 2014
पाकिस्तान की कायरता या भारतीय कमजोरी
कुछ समय से पाकिस्तान लगातार बॉर्डर पर हमला कर रहा है इससे सेना के जवान तो मारे गए ही आम लोगों को जान माल की हानि भी हुई है। यह पाकिस्तान की कायरता है या भारतीय नेताओं की कमजोरी पता नहीं पर लगातार हो रहे हमले के बाद भी अगर हमारे नेता और सेना के अधिकारी फिर भी बात करने के लिए प्रयासरत है तो इसे कायराना हरकत जरुर कहेंगे, और वह भी भारतीयों का। क्योंकि सेना के जवान अपने साथियों को खो रहे है सीमा क्षेत्र से जुड़े गांव के लोग अपनी संपति और परिजनों को खो रहे हैं इसके बाद भी सेना के उच्च अधिकारी और भारतीय नेता अगर बात कर रहे हैं तो यह कायरता होगी। हमारी सेना पाकिस्तानी सेना से कभी कम नहीं रही इसा उदाहरण कारगिल युद्ध से लगा सकते हैं पर क्या भारतीय नेताओं में दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी या फिर वे उस काम को करना नहीं चाहते पता नहीं क्यों इस कायराना हरकत का जवाब वे देना नहीं चाहते। लोक सभा चुनाव के समय तो बहुत गरज-गरज कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था हमारी सेना को कभी शर्म अनुभव नही करना पड़ेगा अब क्या हो गया। क्यों भारतीय सेना को जवाब देने से रोका गया है। क्यों नहीं भारतीय सेना वायु सेना का इस्तेमाल कर के कुछ ही समय में पाकिस्तान को मजा चखाती। फिर जब पाकिस्तान की सेना गोली बारी कर रही है तो इसे क्या वहां के घुसपैठिए की हरकत कही जाएगी। यह गलत नहीं होगा। अगर वहां की सेना पहले से इस तरह की हरकत कर रही है तो हमें हमला क्यों नहीं करना चाहिए भारत किससे डर रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच में क्या दूसरी शक्ति भी काम कर रही है तो वो कौन सी शक्ति है जो दोनों देशों को लड़ाने का काम कर रही है अगर दोनों देशों को लड़ाने का काम हो रहा है तो फिर देश के राज नेता क्या कर रहे हैं। लगातार हो रहे हमले का जवाब आखिर क्यों नहीं दिया जा रहा है? सवाल उठना शुरु हो रहा है अगर जल्द इसका जवाब नहीं तय किया गया और पाकिस्तान को करारा जवाब नहीं दिया गया तो भारतीय नेताओं की कायरता होगी।
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